(19) लकड़हारे की कहानी||||

एक बार एक मजबूत लकड़हारे ने एक लकड़ी के व्यापारी से काम माँगा और उसे काम मिल गया पैसे अच्छे मिल रहे थे और काम भी अच्छा था इसलिए लकड़हारा भी मन लगा कर काम करना चाहता था उसके मालिक ने उसे एक कुल्हाड़ी दी और उसे उसके काम करने की जगह बताई ;पहले दिन लकड़हारा 18 पेड़ काट कर लाया ;मुबारक हो मालिक ने कहा अब उस तरफ जाओ मालिक की बातो से प्रोत्साहित होकर लकड़हारे ने अगले दिन और कोशिश की मगर 15 पेड ही लाया पाया धीरे धीरे वह कम पेड़ लाने लगा

उससे लगने लगा शायद मै अपनी ताक़त खो रहा हु वह मालिक के पास गया और माफ़ी मांगी और कहा की वह समझ नहीं पा रहा है क्या हो रहा है मालिक ने पूछा ; तुमने आखरी बार अपनी कुल्हाड़ी कब तेज की थी तेज मुझे तेज करने का समय ही नहीं था मै तो पेड़ काटने में व्यस्त था

सबक ;

हमारी जिंदगी भी ऐसी ही है कभी कभी हम इतना व्यस्त हो जाते है की कुल्हाड़ी तेज करने का समय ही नहीं निकाल पाते आज के वक़्त में व्यस्त सभी है मगर खुश बहुत कम; ऐसा क्यों है क्या इसलिए क्योकि हम तेज रहना भूल चुके है काम और परिश्रम करना अच्छी बात है मगर इसका मतलब यह नहीं है की हम जिंदगी की अहम् चीजों को भूल जाये जैसे हमारी निजी जिंदगी ,भगवान् के साथ बिताने का समय ,परिवार के साथ समय , पढ़ने का समय आदि | हम सबको आराम के लिए वक़्त चाहिए , सोचने , जप करने ,सिखने और बढ़ने के लिए वक़्त चाहिए | अगर हम कुल्हाड़ी तेज करने का समय नहीं देंगे , तो हम कमजोर पड़ जायेंगे और अपना जोश खो देंगे |

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